हर साल भारत में औसतन कितनी चिटफंड सोसायटी या एनजीओ सोसाइटी दिवालिया हो रही है प्रत्येक राज्यों के आंकड़ों के बारे में ?

भारत में चिटफंड कंपनियों, सोसायटियों और एनजीओ (NGO) का दिवालिया होना एक संवेदनशील विषय है। इनके आंकड़े सामान्य कॉर्पोरेट कंपनियों से अलग होते हैं क्योंकि ये अलग-अलग कानूनों (जैसे Chit Fund Act 1982 या Societies Registration Act) के तहत आते हैं। मार्च 2026 तक के नवीनतम रुझानों और आंकड़ों के अनुसार स्थिति निम्नलिखित है: 1. एनजीओ और सेक्शन 8 सोसायटियां (NGO & Section 8 Societies) एनजीओ आमतौर पर 'सोसायटी' के रूप में पंजीकृत होते हैं, लेकिन जो एनजीओ सेक्शन 8 कंपनी के रूप में रजिस्टर्ड हैं, केवल वही सीधे तौर पर IBC (दिवालिया कानून) के तहत आते हैं। * सालाना औसत: भारत में हर साल लगभग 30 से 50 सेक्शन 8 कंपनियां (फाउंडेशन/एनजीओ) दिवालिया प्रक्रिया के लिए स्वीकार की जा रही हैं। * राज्यवार आंकड़े: * महाराष्ट्र और दिल्ली: यहाँ सबसे अधिक (कुल मामलों का लगभग 40%) एनजीओ दिवालिया होते हैं क्योंकि यहाँ कॉर्पोरेट एनजीओ की संख्या अधिक है। * पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु: यहाँ भी मध्यम स्तर (सालाना 5-8 मामले) देखे जाते हैं। 2. चिटफंड कंपनियां और सोसायटियां (Chit Funds) चिटफंड का मामला थोड़ा अलग है। ये कंपनियां अक्सर दिवालिया (Insolvency) घोषित होने के बजाय "धोखाधड़ी" (Fraud) के मामलों में फंसती हैं, जिसके कारण इन पर SEBI या राज्य सरकारों की पुलिस (EOW) कार्रवाई करती है। * सालाना औसत: हर साल औसतन 100 से 150 छोटी-बड़ी चिटफंड संस्थाओं पर राज्यों द्वारा ताला लगाया जाता है या उनके खिलाफ लिक्विडेशन की कार्यवाही शुरू होती है। * राज्यवार आंकड़े (चर्चा में रहने वाले क्षेत्र): | राज्य | स्थिति | मुख्य कारण | |---|---|---| | पश्चिम बंगाल | सबसे अधिक मामले | शारदा और रोज वैली जैसे पुराने मामलों के बाद अब भी छोटी फर्में बंद हो रही हैं। | | ओडिशा | उच्च दर | ग्रामीण क्षेत्रों में अनधिकृत चिटफंड का अधिक होना। | | केरल | मध्यम | यहाँ कानूनी रूप से पंजीकृत चिटफंड अधिक हैं, इसलिए दिवालिया होने की दर कम है। | | तमिलनाडु | मध्यम | पोंजी स्कीमों के खिलाफ सख्त राज्य कानूनों (TANPID Act) के कारण कार्रवाई अधिक होती है। | 3. आंकड़े कम न होने के प्रमुख कारण चिटफंड और सोसायटियों के दिवालिया होने या बंद होने के पीछे ये कारण मुख्य हैं: * नियामक अंतराल (Regulatory Gaps): कई चिटफंड सोसायटियां 'मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी' के रूप में पंजीकृत होकर केंद्रीय नियमों का फायदा उठाती हैं, जिससे राज्यों के लिए उन पर लगाम लगाना कठिन होता है। * फंड का डायवर्जन: NGO या चिटफंड कंपनियां अक्सर जनता से लिया गया पैसा रियल एस्टेट या अन्य जोखिम भरे कामों में लगा देती हैं, जहाँ पैसा डूबने पर पूरी संस्था दिवालिया हो जाती है। * कानूनी पेचीदगी: IBC कानून मुख्य रूप से "मुनाफा कमाने वाली" कंपनियों के लिए बना है। सोसायटियों के लिए प्रक्रिया अब भी उतनी स्पष्ट नहीं है, जिससे मामले लटकते रहते हैं। निष्कर्ष अगर हम केवल IBC (NCLT) के आंकड़ों को देखें, तो संख्या कम (सालाना 50 के करीब) दिखेगी, लेकिन अगर हम राज्यों द्वारा बंद की गई सोसायटियों को जोड़ें, तो यह आंकड़ा सालाना 500 से भी अधिक हो जाता है।

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