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आदिवासी जौनसार क्षेत्र की जमीनी हकीकत और सरकारी घोषणाओं के बीच कितना बड़ा कानूनी पेंच और विरोधाभास ?
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जमीनी हकीकत सरकारी घोषणाओं के बीच कितना बड़ा **कानूनी पेंच और विरोधाभास (Contradiction)** है।
पुकार स्किल वलपमेंट फाउंडेशन-P.S.D.F (pukar skill development foundation) कालसी उत्तराखंड द्वारा उठाई गई यह मांग पूरी तरह से तार्किक और मानवाधिकारों पर आधारित है।
आइए इस पूरे कानूनी पेंच, 'नया भूमि अधिग्रहण' बनाम 'लखवाड़-इच्छाड़ी के पुराने पेंडिंग मामलों' और नैनबाग (टिहरी गढ़वाल) के बराबर मुआवजे की मांग को गहराई से समझते हैं:
### 1. सरकार की चालाकी: नई नीति (LARR 2013) बनाम 1970 का पुराना अधिग्रहण
सरकार ने जिस **"तीन गुना मुआवजे"** या अनुग्रह राशि (Ex-gratia) की बात की है, वह वास्तव में **'राइट टू फेयर कम्पेनसेशन एक्ट, 2013' (LARR Act)** के बाद अधिसूचित की जा रही नई भूमियों या हालिया संशोधनों पर लागू होती है।
यहाँ पर लखवाड़ और इच्छाड़ी बांध प्रभावितों के साथ जो ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, उसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
* **घोषणा 1970 की, मुआवजा आज तक अधूरा:** लखवाड़-व्यासी परियोजना 1970 के दशक में स्वीकृत हुई थी। उस समय उत्तर प्रदेश सरकार के दौरान जमीनें 'कागजों में' अधिग्रहित कर ली गई थीं।
* **पुराने रेट का नुकसान:** सरकार का तर्क रहता है कि चूंकि अधिग्रहण दशकों पहले (पुराने कानून के तहत) हो चुका था, इसलिए वे आज की तारीख का 'नया मार्केट रेट' देने के कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। इसी कानूनी लूपहोल (खामी) के कारण आदिवासियों को दशकों तक लटका कर रखा गया और बेहद मामूली दरें दी गईं।
### 2. पुकार फाउंडेशन की मांग: "कटौती के बाद समान मुआवजा" (नैनबाग मॉडल)
फाउंडेशन ने मानवाधिकारों और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के तहत जो फॉर्मूला सरकार के सामने रखा है, वह आदिवासियों के साथ हो रहे आर्थिक भेदभाव को सीधे चुनौती देता है।
**फाउंडेशन के फॉर्मूले का गणित:**
* **नैनबाग (टिहरी गढ़वाल) से तुलना क्यों?** नैनबाग भी यमुना घाटी का हिस्सा है और टिहरी गढ़वाल (सामान्य गैर-जनजातीय क्षेत्र) में आता है। वहाँ लखवाड़ बांध के डूब क्षेत्र या अन्य विकास परियोजनाओं में जो मुआवजा दरें तय की गईं, वे जौनसार-बावर (आदिवासी क्षेत्र) के मुकाबले काफी अधिक थीं।
* **समानता का सिद्धांत:** फाउंडेशन का कहना है कि जब बांध एक है, नदी एक है, और विस्थापन का दर्द एक जैसा है, तो केवल 'आदिवासी क्षेत्र' (चकराता/कालसी) होने के कारण यहाँ के लोगों को कम मुआवजा क्यों मिले?
* **अतीत की राशि को एडजस्ट करना:** आदिवासियों को पहले जो थोड़ा-बहुत या नाममात्र का मुआवजा (मान लीजिए १०-२०% जो भी मिला था) दिया जा चुका है, उसे नैनबाग के कुल वर्तमान मुआवजे में से **घटाकर (deduct करके)**, बची हुई पूरी सम्मानजनक राशि आज के बाजार भाव या नैनबाग के बराबर तुरंत दी जानी चाहिए।
### 3. कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें (जिसके खिलाफ लड़ाई जारी है)
इस मामले में सरकार और प्रशासन निम्नलिखित तकनीकी बहाने बनाकर आदिवासियों के हक को दबाने का प्रयास करते रहे हैं:
* **सर्कल रेट का अंतर:** सरकार का नियम है कि मुआवजा जिला प्रशासन द्वारा तय 'सर्किल रेट' के आधार पर मिलता है। चकराता/कालसी के ग्रामीण व आदिवासी इलाकों के सर्किल रेट जानबूझकर विकास नगर या नैनबाग के बाजारों के मुकाबले बहुत कम रखे गए हैं। फाउंडेशन इसी का विरोध कर रहा है कि बांध के मामले में सर्किल रेट नहीं, बल्कि **"समान विस्थापन, समान मुआवजा"** का सिद्धांत लागू होना चाहिए।
* **अधिग्रहण की तारीख का विवाद:** कानूनी रूप से सरकार कहती है कि मुआवजा उस तारीख से तय होता है जब 'धारा 4' (अधिग्रहण की पहली अधिसूचना) जारी हुई थी। चूंकि लखवाड़ के मामले में यह प्रक्रिया 1970-80 के दशक की है, इसलिए सरकार नए कानून के तहत पूरा लाभ देने में आनाकानी करती है।
### आगे की राह और मानवाधिकार का पक्ष
पुकार फाउंडेशन की यह लड़ाई केवल पैसों की नहीं, बल्कि **आदिवासी अस्मिता और उनके कानूनी अधिकारों** की है।
भारतीय संविधान के तहत जनजातीय क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्राप्त है, और किसी भी कल्याणकारी सरकार को 'पुराने कानून' की आड़ लेकर आदिवासियों को उनके हक से वंचित नहीं करना चाहिए। यदि टिहरी गढ़वाल के नैनबाग क्षेत्र के प्रभावितों को बेहतर मुआवजा मिल सकता है, तो देहरादून जिले के जौनसार-बावर के आदिवासियों को उससे कम मिलना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन और भेदभाव है।
इस मामले को पूरी तरह सुलझाने के लिए क्या स्थानीय स्तर पर कोई बड़ी जन-अदालत या कोर्ट केस (PIL) दायर करने की तैयारी चल रही है, या आप इसके किसी विशेष कानूनी दस्तावेज (Court Ruling) का विवरण देखना चाहते हैं?
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