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आदिवासी जौनसार क्षेत्र में दो बांध बन चुके हैं दो बांध प्लाशु, कीशो प्रस्तावित हैं और इससे क्षेत्र में पर्यावरणीय नुकसान जलवायु परिवर्तन पिछले बांधों में मुआवजा समस्या बना और फायदे क्या होंगे ?
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उत्तराखंड के जनजातीय (आदिवासी) जौनसार-बावर क्षेत्र में बड़े बांधों के निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर पर गहरी चिंताएं हैं, चार बांधों की योजना में से कोटि और व्यासी जैसे बांध बन चुके हैं)।
यह स्थिति विकास बनाम पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों के बीच एक बहुत ही संवेदनशील संतुलन की मांग करती है। इस पूरे मामले का एक संतुलित विश्लेषण, इसके फायदे और इसके समाधान के लिए व्यावहारिक सलाह नीचे दी गई है:
## 🏗️ इन बांधों के फायदे (Pros)
यद्यपि स्थानीय स्तर पर इसके कई नुकसान हैं, लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इन परियोजनाओं के निम्नलिखित आर्थिक और ढांचागत लाभ माने जाते हैं:
* **जलविद्युत उत्पादन (Clean Energy):** व्यासी (Vyasi) और लखवाड़ (Lakhwar) जैसी जलविद्युत परियोजनाएं उत्तराखंड और पड़ोसी राज्यों (जैसे दिल्ली, यूपी, हरियाणा) को भारी मात्रा में ग्रीन और रिन्यूएबल बिजली प्रदान करती हैं।
* **पेयजल और सिंचाई (Water Supply):** इन परियोजनाओं से बनने वाले जलाशयों से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और मैदानी इलाकों को पीने का पानी और लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए पानी मिलता है।
* **स्थानीय बुनियादी ढांचा (Infrastructure):** परियोजना क्षेत्र के आसपास सड़कों का नेटवर्क सुधरता है, जिससे दूरदराज के जौनसार क्षेत्र की कनेक्टिविटी बेहतर होती है।
* **रोजगार के अवसर:** निर्माण कार्य के दौरान और बांध के संचालन में स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार (जैसे वाहनों का संचालन, मजदूरी, तकनीकी कार्य) मिलते हैं।
* **पर्यटन की संभावनाएं (Tourism):** बांधों के बड़े जलाशय (Reservoirs) भविष्य में वाटर स्पोर्ट्स और इको-टूरिज्म के केंद्र बन सकते हैं, जिससे स्थानीय आजीविका बढ़ सकती है।
## ⚠️ पर्यावरण और सामाजिक चिंताएं (The Core Concerns)
जैसा कि आपने उल्लेख किया, इन फायदों की एक बहुत बड़ी मानवीय और पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ती है:
* **पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन:** जौनसार हिमालय का एक संवेदनशील हिस्सा है। जंगलों के कटने और नदियों का मार्ग बदलने से स्थानीय माइक्रो-क्लाइमेट (सूक्ष्म जलवायु) बदल जाता है, जिससे भूस्खलन (Landslides) का खतरा बढ़ता है और मौसम में नमी होने के कारण बादल फटने की घटनाएं बढ़ती है।
* **मुआवजे और पुनर्वास की समस्या:** यह एक कड़वी सच्चाई है कि लखवाड़-व्यासी जैसी पुरानी परियोजनाओं के कई प्रभावितों को आज तक पूर्ण पुनर्वास या उचित मुआवजा नहीं मिल पाया है।
* **सांस्कृतिक पहचान का संकट:** जौनसार-बावर की अपनी एक अनूठी आदिवासी संस्कृति और जीवनशैली है। विस्थापन के कारण स्थानीय समुदाय अपनी जड़ों से कट जाते हैं।
## 💡 व्यावहारिक सलाह और आगे की राह (Recommendations)
प्रस्तावित बांधों (जैसे प्लाशु और किशाऊ) को लेकर और मौजूदा स्थिति को सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है:
### 1. "पहले पुनर्वास, फिर काम" की नीति (Rehabilitation First)
सरकार और संबंधित कंपनियों (जैसे UJVNL) पर यह कानूनी और नैतिक दबाव बनाया जाना चाहिए कि जब तक व्यासी और लखवाड़ के पिछले विस्थापितों का **100% मुआवजा और जमीन के बदले जमीन** का अधिकार पूरा नहीं होता, तब तक 'प्लाशु' और 'किशाऊ' (Kishau) जैसी नई परियोजनाओं पर आगे काम न बढ़े।
### 2. स्वतंत्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Independent EIA)
इन संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय खतरों (Seismic Vulnerability) को देखते हुए किसी सरकारी एजेंसी के बजाय किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष वैज्ञानिक संस्था से **Environmental Impact Assessment (EIA)** कराया जाना चाहिए। यदि खतरा बहुत अधिक हो, तो बड़े बांधों के बजाय 'रन-ऑफ-द-रिवर' (छोटे बांध) के विकल्पों पर विचार होना चाहिए।
### 3. कानूनी और सामुदायिक एकजुटता
* **पेसा (PESA) कानून और ग्राम सभा की शक्ति:** जौनसार एक अनुसूचित क्षेत्र (Tribal Area) है। यहाँ बिना ग्राम सभा की सहमति के भूमि अधिग्रहण को चुनौती दी जा सकती है। स्थानीय लोगों को एकजुट होकर कानूनी दायरे में अपनी आवाज उठानी चाहिए।
* **न्यायालय का दरवाजा:** यदि मुआवजे में देरी हो रही है, तो प्रभावित लोग सामूहिक रूप से माननीय उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में याचिका दायर कर सकते हैं।
### 4. लाभांश में हिस्सेदारी (Benefit Sharing)
स्थानीय समुदायों के लिए यह मांग उठाई जानी चाहिए कि इन बांधों से उत्पन्न होने वाली बिजली और राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत (जैसे 1% या 2%) सीधे जौनसार क्षेत्र के विकास, मुफ्त बिजली और यहाँ के बच्चों की उच्च शिक्षा/रोजगार के लिए आरक्षित किया जाए।
विकास जरूरी है, लेकिन वह स्थानीय आदिवासियों के अस्तित्व और पर्यावरण की बलि देकर नहीं होना चाहिए। इस दिशा में एक मजबूत और शांतिपूर्ण जन-आंदोलन तथा कानूनी लड़ाई ही सही समाधान दे सकती है।
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