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आदिवासी जौनसार क्षेत्र में बने कोटि इच्छाड़ी बाँध और व्यासी बाँध,चकराता टाउनशिप के मुआवजा सर्किल रेट में कितना अंतर जबकि फाउंडेशन-P.S.D.F द्वारा मानव अधिकार में सामान्य जितना सर्किल रेट पर मुआवजा की मांग ?
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उत्तराखंड के आदिवासी जौनसार-बावर क्षेत्र (कालसी-चकराता) में बड़े बांधों (जैसे इच्छाड़ी बांध, व्यासी बांध, लखवाड़ बांध) और प्रस्तावित चकराता टाउनशिप जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और मुआवजे की विसंगति एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानवाधिकार उत्तराखंड में मुद्दा रहा है।
'पुकार स्किल डवलपमेंट फाउंडेशन-P.S.D.F (Pukar skill development foundation) कालसी' द्वारा उठाए जा रहे मानवाधिकार के मुद्दों, शहरी बनाम ग्रामीण मुआवजे के अंतर और इन दोनों बांधों के मुआवजे से जुड़ी जमीनी हकीकत को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
### 1. कोटि इच्छाड़ी बांध और व्यासी बांध के मुआवजे में अंतर
इच्छाड़ी बांध (टोंस नदी पर) और व्यासी बांध (यमुना नदी पर) दोनों ही यमुना घाटी की जलविद्युत परियोजनाओं का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों के निर्माण के समय और मुआवजे के नियमों में **बड़ा ऐतिहासिक व मौद्रिक अंतर** है:
* **ऐतिहासिक अंतर (निर्माण का समय):** **इच्छाड़ी बांध** का निर्माण 1960-70 के दशक में हुआ था। उस समय पुराना भू-अधिग्रहण कानून (1894) लागू था, जिसके तहत विस्थापितों को बेहद मामूली (कौड़ियों के भाव) मुआवजा दिया गया था। पुनर्वास नीतियां भी बेहद कमजोर थीं, जिससे आदिवासी समाज को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
* **व्यासी व लखवाड़ बांध का मुआवजा:** इसके विपरीत, **व्यासी बांध** और वर्तमान लखवाड़ परियोजना के प्रभावितों को नए नियमों के तहत मुआवजा दिया जा रहा है। हाल ही में (2025-2026 के अपडेट के अनुसार) उत्तराखंड सरकार ने लखवाड़-व्यासी प्रभावितों के लिए **मुआवजे की राशि को तीन गुना (Threefold)** करने की मंजूरी दी है, ताकि इसे विकास नगर और नैनबाग (टिहरी) क्षेत्र के बराबर या उसके मुकाबले सम्मानजनक स्तर पर लाया जा सके। इसके तहत करीब 45 हेक्टेयर से अधिक भूमि के लिए करोड़ों रुपये का अनुग्रह अनुदान (Ex-gratia) वितरित किया जा रहा है।
### 2. विकास नगर/नैनबाग बनाम आदिवासी क्षेत्र (जौनसार) के मुआवजे की विसंगति
पुकार स्किल डेवलपमेंट फाउंडेशन कालसी और स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा मानवाधिकारों के तहत जिस मुख्य विसंगति को उठाया जा रहा है, वह **"नगरीय/शहरी मुआवजा (Urban Compensation) बनाम ग्रामीण मुआवजा"** का भेदभाव है:
| क्षेत्र / पैमाना | विकास नगर / नैनबाग क्षेत्र | जौनसार (आदिवासी/ग्रामीण क्षेत्र) |
|---|---|---|
| **जमीन का वर्गीकरण** | शहरी/अर्ध-शहरी (Commercial/Urban Land) | ग्रामीण/आदिवासी कृषि भूमि (Scheduled Tribe Land) |
| **सर्किल रेट और मार्केट वैल्यू** | सर्कल रेट और बाजार मूल्य काफी अधिक हैं। | भौगोलिक विषमता के कारण सर्कल रेट काफी कम तय किए जाते हैं। |
| **मुआवजे का नियम (LARR Act 2013)** | शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य का **1 से 2 गुना** तक मुआवजा मिलता है। | ग्रामीण क्षेत्रों में नियमतः बाजार मूल्य का **2 से 4 गुना** तक मुआवजा मिलता है, लेकिन कम बेस रेट के कारण यह राशि कम रह जाती है। |
| **पिछले 10 सालों का दर्द** | यहाँ शहरी या व्यावसायिक दर से अधिक लाभ मिला। | चकराता टाउनशिप या बांधों के नाम पर जब आदिवासी क्षेत्र की बड़ी भूमि अधिग्रहित की गई, तो उन्हें **कमजोर ग्रामीण/कृषि दरों पर** मुआवजा दिया गया, जो विकास नगर जैसे मैदानी या विकसित बाजारों के मुकाबले बहुत कम था। |
> **मानवाधिकार और भेदभाव का मुद्दा:** 'पुकार फाउंडेशन' का मुख्य तर्क यही है कि जब आदिवासियों की पैतृक भूमि, संस्कृति और आजीविका के साधन (जल, जंगल, जमीन) पूरी तरह छिन जाते हैं, तो उन्हें मैदानी या शहरी क्षेत्रों के समकक्ष या उससे भी बेहतर वित्तीय सुरक्षा (नगरीय/व्यावसायिक दरों पर मुआवजा और पूर्ण पुनर्वास) क्यों नहीं दी जाती?
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### 3. चकराता टाउनशिप और 10 साल का संघर्ष
चकराता और उसके आसपास के आदिवासी क्षेत्र में पिछले एक दशक (10 साल) से सरकार द्वारा विभिन्न पर्यटन, सैन्य और प्रशासनिक बुनियादी ढांचों (टाउनशिप) के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की योजनाएं बनती रही हैं।
* **आदिवासी अधिकारों का हनन (संविधान की पांचवीं/छठी अनुसूची की भावना):** जौनसार-बावर एक अधिसूचित जनजातीय (ST) क्षेत्र है। नियमतः यहाँ बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण से पहले स्थानीय ग्राम सभाओं और 'सयाणा व्यवस्था' (पारंपरिक पंचायत) की स्पष्ट सहमति आवश्यक है।
* **शहरीकरण बनाम आदिवासी पहचान:** विकास नगर और नैनबाग जैसे क्षेत्रों में बाजार और टाउनशिप का विस्तार स्वाभाविक रूप से हुआ, जिससे वहाँ जमीन के दाम आसमान छू गए। लेकिन जब चकराता जैसे आदिवासी क्षेत्रों में सरकार खुद टाउनशिप या बांध बनाने के लिए जमीन लेती है, तो वह आदिवासियों को 'शहरी' या 'व्यावसायिक' दरों पर मुआवजा देने से कतराती है, जिससे स्थानीय लोगों में पिछले 10 वर्षों से गहरा असंतोष है।
### निष्कर्ष
कोटि इच्छाड़ी बांध के समय आदिवासियों को जो नाममात्र का मुआवजा मिला था, उसकी तुलना में व्यासी बांध के प्रभावितों को (लगातार आंदोलन और मानवाधिकार संगठनों के दबाव के बाद) अब कुछ बेहतर और संशोधित मुआवजा (तीन गुना तक वृद्धि) मिल रहा है।
हालांकि, विकास नगर और नैनबाग के मुकाबले जौनसार के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में **सर्किल रेट के कम होने** और **शहरी दरों पर मुआवजा न मिलने** के कारण आज भी जमीन के बदले मिलने वाली वास्तविक रकम में **बहुत बड़ा अंतर (खाई)** बनी हुई है, जिसे पाटने के लिए स्थानीय संस्थाएं मानवाधिकार के स्तर पर लड़ाई लड़ रही हैं।
क्या आप इस विषय में किसी विशिष्ट सरकारी शासनादेश (GR), सर्कल रेट के आंकड़ों या पुनर्वास नीति के कानूनी पहलुओं के बारे में और जानना चाहते हैं?
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